Satya Darshan

बाबा रामदेव और उनका स्वदेशी सुरताल

व्यक्तित्व | मई 8, 2019

वस्तुतः पूँजीवादी व्यवस्था का आम नियम है कि बड़ी मछली छोटी मछली को निगलती है। यानी बड़ी पूँजी छोटी पूँजी को खा जाती है। ऐसा वह अपनी साख, वित्तीय उपायों, उन्नत तकनीक, शासन व प्रशासन में अपने प्रभाव के ज़रिये करती है। 

छोटी मछली को बड़ी मछली बनने के लिए सदैव ही धर्म, नस्ल, अन्धराष्ट्रवाद (या स्वदेशी) इत्यादि की ज़रूरत पड़ती है। ऐसा करके वह न केवल अपने उत्पादों की उत्पादन लागत को कम कर पाने में सफल हो पाती है वरन बिक्री भी बढ़ा पाने में सफल होती है। बाबा रामदेव दोनों हथकण्डे अपनाते हैं। बाबा के ट्रस्टों को कोई भी टैक्स नहीं देना पड़ता। 

धर्म व ‘’देश गौरव” की धुन में मगन बहुत सारे ‘’दानवीरों” का धन (काला या सफेद) भी बाबा के लिए पूँजी की कमी को दूर करता है। धर्म के अन्धे उत्साह में बहुत से स्वयंसेवक बिना मेहनताने के अपना श्रम मुफ्त मुहैया कराते हैं। और फिर मज़दूरों के श्रम का भयंकर शोषण करते हैं, जिसके बग़ैर मुनाफा पैदा होने का सवाल ही नहीं उठता। 

ग़ौरतलब है कि मई, 2005 में न्यूनतम वेतन भी न मिलने की वजह से दिव्य फार्मेसी के मज़दूरों ने हड़ताल कर दी थी। जिन्हें बाद में फैक्टरी से निकाल दिया गया। इससे सहज ही अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि बाबा अपने उत्पादों की लागत को कितना कम कर पाने में सफल होता है। जबकि उत्पादों की कीमत बहुत ऊँची रहने से उसका मुनाफा कई गुना बढ़ जाता है। अब बाबा को स्वदेशी की हूक उठती है। 

बाबा ज़ोर-ज़ोर से प्राचीन भारतीय संस्कृति का गौरव-गान करने लगते हैं, जब लोग योग-बल व आयुर्वेदिक दवाओं का इस्तेमाल कर 200-200 साल निरोग जीते थे। विश्वगुरु भारत की प्रसिद्ध प्राचीन योग परम्परा और आयुर्वेद को अपनाने के बजाय विदेशी कम्पनी व आधुनिक दवाओं के इस्तेमाल करने के लिए बाबा रामदेव देश की जनता को धिक्कारते हैं। पूरे अतीत का महिमामण्डन करते हैं। उन स्वर्णिम दिनों की याद दिलाते हैं जब ‘शेर और बकरी एक घाट पर पानी पीते थे’। 

लूट और शोषण की शिकार जनता बाबा के भ्रमजाल में अपनी सुध-बुध खो बैठती है। बस इसी समय बाबा अपने योग का गुटका व दवाओं की पोटली निकालते हैं। बाबा कहते हैं कि दवा ख़रीदने से विश्वगुरु भारत की महान योग परम्परा की हिफाज़त होगी। लोग निरोग होंगे और पुनः रामराज्य की वापसी होगी। दिव्य दवाइयों की बिक्री बढ़ती है और बाबा खटारा स्कूटर से 10000 करोड़ टर्नओवर वाले ट्रस्टों के स्वामी बन जाते हैं। पर पूँजी की अपनी गति होती है। 

बाबा स्वदेशी का जाप करते-करते अरबों रुपयों से विदेश में (विदेश में!) अमेरिका के ह्यूसटन में 100 एकड़ ज़मीन ख़रीद लेते हैं और स्कॉटलैण्ड में एक द्वीप! और अब स्वदेशी बाबा विदेशी अमेरिकी कम्पनी के साथ उत्पादन करने जा रहे हैं। उम्मीद है कि बाबा के स्वदेशी राग का सुरताल तो अब समझ ही गये होंगे।

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