Satya Darshan

सेना राजनीति गठजोड़ का यह यूरोपीय फासीवादी तरीका समाज, राजनीति और सेना तीनो के लिए घातक

अजय शुक्ला | मई 6, 2019

वर्ष 2009 में जब यूनाइटेड किंगडम में प्रधानमंत्री पद के आकांक्षी डेविड कैमरन ने घोषणा की थी कि पूर्व ब्रिटिश चीफ ऑफ जनरल स्टाफ, जनरल सर रिचर्ड डन्नाट को हाउस ऑफ लॉड्र्स में भेजा जा रहा है तो इसकी सार्वजनिक आलोचना हुई थी।

स्वयं कैमरन की पार्टी के लोगों ने आपत्ति की थी कि वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को दलगत राजनीति से दूर रखने की पुरानी परंपरा तोड़ी जा रही है। एक वरिष्ठ टोरी नेता ने द गार्जियन से कहा था, 'यह समझदारी नहीं है। डन्नाट बहुत अच्छे व्यक्ति हैं लेकिन उन्हें राजनीति का अनुभव नहीं है। उनके पास केवल सैन्य अनुभव है। सेना में उनके उत्तराधिकारी इसे लेकर क्या रुख अपनाएंगे?'

हमारे देश में पिछले दिनों जब रक्षा मंत्री निर्मला सीतारामन ने सात वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को सार्वजनिक समारोह में भाजपा में शामिल किया तब शायद ही किसी ने कुछ कहा।

इन अधिकारियों में से एक लेफ्टिनेंट जनरल जेबीएस यादव ने कहा, 'मैं मानता हूं कि आम मान्यता यही है कि रक्षा बलों के सदस्य किसी राजनीतिक दल में नहीं जाएंगे लेकिन हर व्यक्ति का राजनीतिक विचार होता है...हम केवल हाशिए पर नहीं रह सकते।'

इस माह के आरंभ में पूर्व सैन्य उप प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल शरद चंद को भी इसी प्रकार सत्ताधारी दल में शामिल किया गया। सेवा में रहने के दौरान उन्होंने रक्षा मामलों की स्थायी संसदीय समिति के समक्ष प्रस्तुत होकर कहा था कि सरकार सेना के पुराने उपकरणों को बदलने के लिए पैसा दे पाने में नाकाम रही है। अब सेवानिवृत्ति के एक वर्ष के भीतर वह कह रहे थे, सेना के लिए भाजपा जितना काम किसी ने नहीं किया।

यह सही है कि सेना के अधिकारियों के राजनीति में आने में कोई कानूनी या विधायी बाधा नहीं है, न ही देश के सैन्य अधिकारी सैन्य परंपरा के मुताबिक राजनीति से परहेज करते हैं। फिर भी कई पुराने सैन्य अधिकारियों को सक्रिय राजनीति में आने से एक किस्म का नैतिक परहेज है।

वर्दी पहनने के दिन से ही उन्हें सिखाया जाता है कि वे इन चीजों से निरपेक्ष रहें। सैन्य अधिकारियों के मेस में दो विषयों पर चर्चा वर्जित थी, एक तो महिलाएं और दूसरी राजनीति। यही परंपराएं अब तक सेना को राजनीति से बचाती आई हैं।

यही कारण है कि पूर्व सैन्य सेवा प्रमुखों समेत करीब 500 प्रतिष्ठित वरिष्ठ अधिकारियों ने राष्ट्रपति को याचिका देकर राजनेताओं द्वारा सैन्य कार्रवाइयों का श्रेय लेने की बयानबाजी पर नाराजगी प्रकट की। यहां तक कि सैन्य बलों को 'मोदी जी की सेना' तक कह दिया गया। मीडिया में ऐसी तस्वीरें आती रहीं जहां पार्टी कार्यकर्ता चुनावी मंचों और अभियानों में सैन्य वर्दी पहने नजर आए।

यह सही है कि देश की रक्षा-सुरक्षा किसी भी सरकार का प्राथमिक कर्तव्य है। हर दल को अपने घोषणापत्र में रक्षा को लेकर विस्तृत जानकारी देनी चाहिए। यह बताना चाहिए कि शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा जैसे मदों से अत्यंत कम धनराशि के साथ वे सेना को किस तरह मजबूती देंगे।

हकीकत में सरकारी व्यय के 16 फीसदी की खपत वाले क्षेत्र को लेकर गंभीर बहस के बजाय संभावित शत्रुओं को धमकाकर और शेखी बघारकर मतदाताओं के एक धड़े को संतुष्ट किया जाता है, जबकि संभावित शत्रुओं को रोकने के लिए कुछ खास उपाय नहीं किए जाते।

यहां पर पूर्व सैन्यकर्मियों की अहम भूमिका हो सकती है। मसलन लेफ्टिनेंट जनरल डीएस हुडा ने राष्ट्रीय सुरक्षा नीति तैयार की जो कांग्रेस के घोषणापत्र में रक्षा से जुड़े भाग का हिस्सा है। हुडा ने किसी दल के बजाय अपना अनुभव देशहित में साझा करने की ठानी। 

भारतीय सेना दशकों से संसाधनों के लिए जूझ रही है और उसकी उपेक्षा होती रही है, उससे जुड़े लोगों को राजनेताओं की सराहना के रूप में अचानक मिली चकाचौंध पसंद आ सकती है। ये सुर्खियां छंटने के बाद सैन्यकर्मियों को अहसास होता है कि उनके हालात तो जस के तस हैं।

अधिक बजट, आधुनिकीकरण, बेहतरीन हथियार आदि के वादे हवा हो जाते हैं। सरकार और रक्षा मंत्रालय हजारों सेवानिवृत्त अपंग सैन्य कर्मियों के संभावित लाभ की राह का रोड़ा बन जाते हैं।  सैनिकों की बहादुरी के बखान के बीच देश के राजनीतिक वर्ग द्वारा सेना को हाशिए पर रखने का आकलन बीते दो दशक में चुनाव मैदान में उतरे सैन्य कर्मियों के आधार पर किया जा सकता है।

किंग्स कॉलेज लंदन में भारतीय मामलों के जानकार वाल्टर सी लैडविग ने लोकसभा में सैन्यकर्मियों के प्रतिशत की तुलना यूके की संसद और अमेरिकी कांग्रेस के प्रतिशत से की है। सन 1970 के दशक में 70 फीसदी अमेरिकी कांग्रेस सदस्य सैन्यकर्मी थे। ऐसा वियतनाम युद्घ के समय अनिवार्य सैन्य सेवा के कारण हुआ।

सन 1990 तक यह प्रतिशत गिरकर 50 फीसदी पर आ गया। आज, केवल 19 फीसदी अमेरिकी कांग्रेस सदस्य पूर्व सैन्यकर्मी हैं। यूके में यह आंकड़ा 8 फीसदी के आसपास है जबकि भारत में पहली से 14वीं लोकसभा तक केवल 2.4 फीसदी पेशेवर ही सदस्य बने। इनमें पुलिसकर्मी, पूर्व सैन्यकर्मी और डॉक्टर, इंजीनियर जैसे पेशेवर थे। 

चुनाव आयोग के आंकड़े बताते हैं कि 1999 के आम चुनाव में 16 पूर्व सैन्य अधिकारियों को टिकट दिया गया था। 2004 में इनकी संख्या घटकर 10 रह गई और 2014 में दोबारा बढ़कर 16 हो गई। यह तादाद कुछ अधिक हो सकती है क्योंकि लैडविग ने सदस्यों के नाम के साथ जुड़े सैन्य परिचय का इस्तेमाल किया। इसमें जनरल वीके सिंह जैसे लोग शामिल नहीं थे जिन्होंने अपनी रैंक का त्याग किया।  

कई अराजनीतिक सैन्यकर्मियों के लिए आज अहम सवाल यह है कि क्या सेना का भगवाकरण हो रहा है? याद रहे कि दुनिया भर की सेनाएं रुढिवादी होती हैं और उनमें भाजपा जैसे दल की ओर झुकाव की प्रवृत्ति होती है। चिंता की बात है, संघ परिवार द्वारा सैनिकों का देवताकरण। मीडिया इसमें सहायक है।

सैन्य अधिकारियों का प्रयोग सरकार का नजरिया रखने के लिए किया जा रहा है या फिर आलोचकों को जवाब देने में। यह उचित नहीं। यह यूरोपीय फासीवादी तरीका समाज, राजनीति और सेना किसी के लिए उचित नहीं। समय आ गया है कि सैन्य अधिकारी इससे दूरी बनाएं।

 

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