Satya Darshan

बेहाल करती चुनावी ड्यूटी सरकार पर एक गंभीर सवाल है

शैलेंद्र सिंह | मई 6, 2019

लोकसभा चुनाव की पूरी प्रक्रिया बेहद लंबी है. लगभग 2 महीने तक चुनाव का कामकाज चल रहा है. बहुत सारे सरकारी विभागों में कामकाज ठप्प है. सरकारी कर्मचारी चुनावी ड्यूटी पर है. यहा तक की पुलिस विभाग में भी बहुत सारे केस पेडिंग है. पुलिस चुनावी ड्यूटी में लगी है. 

सबसे खराब हालत पोलिंग बूथ पर ड्यूटी देने वाले कर्मचारियों की होती है. इनको अपने घर से दूर गांव-गांव ऐसी जगहों पर जाना होता है जहां रहने खाने तक की कोई व्यवस्था नहीं होती है. किसी जानपहचान वाले के घर रूकना या फिर मतदान स्थल पर रात गुजारनी पड़ती है. इस दौरान वह अपने घर परिवार के संपर्क से भी दूर रहते है. ड्यूटी के समय उनको अपने फोन तक के प्रयोग की अनुमति नही होती है. 

सबसे अधिक परेशानी शिक्षा विभाग में काम करने वाली शिक्षिकाओं की है. इनमें से तमाम के छोटे बच्चे है. एकल परिवार में रहने के कारण वह बच्चों को छोड़ नहीं सकती और ड्यूटी के समय साथ भी नहीं रख सकती.

इनकी ड्यूटी जब गांव देहात के एरिया में लग जाती है तो उसको संभालना मुश्किल हो जाता है. मतदान वाले दिन की ड्यूटी ज्यादा कठिन होती है. सुबह 5 बजे मतदान स्थल पर पहुंचना पड़ता है. इसके लिये रात भर का सफर करना पड़ता है. मतदान खत्म होने के बाद भी उनको छुटटी तब मिलती है जब मतपेटी जमा हो जाती है और सारे कागजात का मिलान हो जाता है. 

बहुत सारे मतदान स्थल गांव के सरकारी स्कूलों में होते है. जहां आज भी महिलाओं के लिये साफ सुथरे शौचालय नहीं है. स्कूल में एक ही शौचालय होता भी है तो उसका प्रयोग करने वालों की संख्या बढ जाती है. शौचालय को साफ करने वाले नहीं होते है.

इसके अलावा रात रूकने की व्यवस्था गांव में नहीं होती. गरमी और मच्छरों से भरी रात किसी कैदखाने से कम नहीं होती है. चुनावी ड्यूटी से बचने के लिये कर्मचारी बहुत तरह से कोशिश करते है. इसके बाद भी उनको चुनावी ड्यूटी में जाना ही पडता है. लोकसभा चुनाव में 7 चरण पूरे 2 माह के कार्यक्रम से बनाये गये है. 

ऐसे में मतगणना के बाद ही चुनावी छुट्टी से मुक्ति मिलती है. इस दौरान तमाम कर्मचारी बीमार हो जाते है. गर्मी में चुनाव होने के कारण परेशानी और भी अधिक होती है. चुनाव दर चुनाव यह परेशानियां बढती जा रही है. इसके अलावा महिला कर्मचारियों को चुनाव के दिन मतदान स्थल पर तमाम तरह की परेशानियों का सामना करना पडता है. कई बार यहां पर लड़ाई झगड़ा, गाली गलौच भी होता है. ऐसे में उनको यह सब भी सहना पडता है. 

नाम ना छापने की शर्त पर कई महिला कर्मचारियों ने बताया कि मतदान वाले दिन वह लोग पानी कम पीते है. जिससे उनको कम से कम शौचालय का प्रयोग करना पड़े. इससे शाम तक कई की तबीयत खराब हो गई. अपने 5 माह के बच्चे को छोड़ कर मतदान स्थल पर ड्यूटी दे रही महिला टीचर ने बताया कि चुनावी ड्यूटी किसी प्रताड़ना से कम नहीं होती है. 

सरकार किसी तरह की कोई व्यवस्था नहीं करती. अधिकारी कोई बात सुनते नहीं. ज्यादा कहों तो निजी दुश्मनी मानकर प्रताड़ित करते है. कई बार तो साथी पुरूष कर्मचारी इन हालातों से मजा लेते है. चुनाव सुधार की बात करते समय ऐसी चुनावी ड्यूटी को भी सरल करने पर विचार करना चाहिये. 

देश चलाने के लिए चुनाव से होकर गुजरना ही पड़ता है तो क्या यह उचित न हो कि चुनाव आयोग चुनावी ड्यूटी में स्वयं के कर्मचारियों को लगाये. जिससे अन्य विभागों का कार्य भी सुचारू रूप से चलता रहे और चुनावी प्रक्रिया भी. हांलाकि इसके लिए बड़ी संख्या में कर्मचारियों की भरती करनी पड़ेगी. इसके दूरगामी प्रभाव को देखते हुए यह कोई बोझ या दुष्कर कार्य नहीं है. नयी नौकरियां तो सृजित होंगी ही. हर चुनाव के पहले विभिन्न विभागों से आये कर्मचारियों की बारंबार ट्रेनिंग आदि के खर्च भी बचेंगे. 

अगर सरकार को यह लगता हो कि पांच साल में एक बार ही चुनाव होते हैं इसके लिए अलग से नौकरियां क्यों सृजित की जायें तो सरकार यह देखे कि देश मे लगभग हर साल ही चुनाव कहीं न कहीं होते रहते हैं. बेरोजगारी के चरम के बीच और देश को नेतृत्व देने की एकमात्र जिम्मेदार संस्था चुनाव आयोग के पास इस अहम प्रक्रिया के लिए अपने खुद के कर्मचारी ही नहीं है ये कितनी शर्मनाक बात है.

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