Satya Darshan

अति से अतिवाद की राजनीति में भाजपा

मिहिर शर्मा | मई 1, 2019

ऐसा प्रतीत होता है कि एक पुराना चुटकुला भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर अब भी लागू होता है। यह चुटकुला कई बार कार्टून के रूप में तो कई बार शब्दों में भी प्रकट किया जाता है। 

बहरहाल, यह चुटकुला कहता है कि भाजपा का हर अतिवादी चेहरा समय बीतने के साथ-साथ सहिष्णु बन जाता है। यह बदलाव उनके नजरिए में नहीं आता है बल्कि ऐसा इसलिए होता है कि उनसे कहीं अधिक अतिवादी विचारों वाला कोई अन्य नेता आ जाता है और उनके हिस्से का आकर्षण चुरा लेता है। 

इसी तर्ज पर अटल बिहारी वाजपेयी ने लालकृष्ण आडवाणी का मार्ग प्रशस्त किया और आडवाणी ने नरेंद्र मोदी का। जरा इस दौरान आए बदलाव पर गौर करें: वाजपेयी ऐसे शब्द बोलते थे, जो दंगा करा सकते थे लेकिन वह ऐसी तमाम घटनाओं से स्वयं कोसों दूर रहे जिन्हें उन्होंने भड़काया। 

उदाहरण के लिए बाबरी मस्जिद का विध्वंस। आडवाणी उस दौरान घटना स्थल पर मौजूद थे लेकिन उन्होंने उस घटना पर गौरवबोध जताने के बजाय सार्वजनिक रूप से शर्मिंदगी जताई। मोदी ने ऐसी घटनाओं के साथ अवज्ञा और गौरव का भाव जोड़ दिया। सन 2002 के बाद हुए चुनाव प्रचार अभियान में हमने ऐसा देखा। यानी हमने उन्हें कदम दर कदम अतिवाद की ओर बढ़ते देखा। 

कई लोग मानते हैं कि इस कड़ी में अगला नाम अमित शाह का होगा। मोदी ने 2000 के दशक में जो बयानबाजियां कीं, वे भले ही खतरनाक रही हों लेकिन कम से कम उन पर मानव हत्या जैसा गंभीर आरोप कभी नहीं लगा। शाह पर यह आरोप लगा था और मोदी के सत्ता में आने के छह महीने बाद वह बरी हो गए थे। परंतु मोदी के बाद शाह के बजाय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अगले चरण के हकदार नजर आते हैं। 

प्रधानमंत्री ने कहा था कि देश की रक्षा के लिए 56 इंच के सीने की आवश्यकता है लेकिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के साथ खतरे का असली चित्र नजर आता है। ऐसा इसलिए कि वह पूर्वी उत्तर प्रदेश की राजनीति से उभरे हैं और हिंदू युवा वाहिनी के रूप में लंबे समय से उनका अपना एक दस्ता है।

परंतु, भाजपा संतुष्ट नहीं है। उसने अपनी सबसे सुरक्षित सीटों में से एक भोपाल से प्रज्ञा सिंह ठाकुर को प्रत्याशी बनाकर मानो आदित्यनाथ को भी सहिष्णु बता दिया है। ठाकुर पर आतंकी गतिविधि का आरोप है और वह फिलहाल खराब स्वास्थ्य के कारण जमानत पर हैं। आदित्यनाथ पर औपचारिक रूप से डराने-धमकाने और छिटपुट हिंसा के आरोप हैं लेकिन ठाकुर के खिलाफ आरोप कहीं अधिक गंभीर प्रकृति के हैं। 

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बेहद सावधानीपूर्वक विकास की बात करते रहते हैं, हालांकि इस बीच उनकी सरकार लगातार बूचडख़ानों को बंद करती रही है और वह बोतलबंद गो उत्पादों को बढ़ावा देती है। भोपाल की भावी सांसद राष्ट्रीय टेलीविजन पर खुलकर दावा करती हैं कि पंचगव्य (विभिन्न गो उत्पादों से निर्मित) से उनका कैंसर ठीक हुआ। 

धार्मिक अतिवाद के बारे में एक दिलचस्प बात यह है कि उसमें और अधिक अतिवाद की गुंजाइश हमेशा रहती है। मैं यह सोचकर चकित हूं कि भला ऐसा कौन होगा जिसके सामने ठाकुर भी समझदार मानी जाएंगी। सवाल यह उठता है कि भाजपा लगातार इस प्रकार दक्षिणावर्त क्यों हो रही है? इसके दो अलग-अलग उत्तर हैं और उनमें से कोई भी बहुत आश्वस्त करने वाला नहीं है।

पहली बात, असली भाजपा हमेशा अपने नेताओं द्वारा कही गई बातों की तुलना में अधिक दक्षिणपंथी रहती है। गोविंदाचार्य ने जब कहा था कि वाजपेयी भाजपा का मुखौटा हैं जबकि पार्टी को नेतृत्व आडवाणी जैसे नेता का चाहिए, तब उनका कहने का तात्पर्य यही था। कहने का अर्थ यह कि पार्टी के किसी भी नेता का लक्ष्य होता है उसकी मूल विचारधारा का स्वीकार्य चेहरा प्रस्तुत करना। 

यह अपने आप में कोई सुखद विचार नहीं है क्योंकि इससे यह संकेत जाता है कि भाजपा एक तरह के दोहरेपन के साथ संचालित होती है। दूसरी ओर, पार्टी यह मानकर चलती है कि जनता किसी भी समय इन सैद्धांतिक भाजपाई मान्यताओं की तुलना में अधिक सहिष्णु होती है और अगर उसे सीधे सीधे समझाइश दी गई तो वह नाराज हो सकती है।

दूसरी संभावना यह है कि भाजपा देश की जनता में आ रहे दक्षिणपंथी बदलाव को परिलक्षित भर कर रही हो। या कम से कम वह अपने मूल मतदाता आधार को संबोधित करती है जिसमें प्रमुख तौर पर देश के उत्तर और पश्चिम के राज्यों की जनता आती है। यह वह दृष्टिकोण है जो मानता है कि स्वयं मोदी भी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाकर बहुत प्रसन्न नहीं थे लेकिन वह प्रदेश की जनता और हिंदुत्व के सिपाहियों में उनकी लोकप्रियता के चलते ऐसा करने के लिए मजबूर हुए। 

जो लोग उत्तर प्रदेश से परिचित हैं, वे आपको बताएंगे कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू महासभा के लोगों को भी लगता है कि वे अपने समर्थक गंवा रहे हैं क्योंकि कई समर्थकों को लगता है कि स्थानीय राजनीति में प्रत्यक्ष लड़ाई वाली शैली अधिक बेहतर है। इससे यह चिंताजनक आशंका उत्पन्न होती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहिष्णु ही नहीं दिख रहे हैं बल्कि इस समय वह देश के उत्तरी और पश्चिमी क्षेत्र की राजनीति के केंद्र भी हैं। 

जो लोग कहीं अधिक उदार परंपरा से आते हैं, उनके लिए भाजपा और हिंदुत्व का घालमेल करना आसान है। यह भी सही है कि ये सभी राष्ट्रीय सद्भाव और संवैधानिक मूल्यों के लिए नुकसानदेह हैं। परंतु चूंकि हिंदू राष्ट्रवाद अब देश के अधिकांश हिस्सों में राजनीतिक दबदबा रखता है, तो ऐसे में यह एक कमजोर राजनीतिक विश्लेषण माना जाएगा। 

भाजपा के नेतृत्व पर लगातार यह खतरा बना हुआ है कि वह और अधिक दक्षिण की ओर झुक जाएगा। लोकतांत्रिक राजनीति को निर्वात पसंद नहीं है। अगर भाजपा नई कांग्रेस बन जाती है और देश के बड़े हिस्से की राजनीति पर काबिज हो जाती है तो उसके भीतर ही एक प्रतिपक्ष तैयार होने लगेगा। यह प्रतिपक्ष दक्षिणपंथ से ही उभरेगा। मोदी, शाह और आरएसएस को वास्तव में इस बात से चिंतित होना चाहिए।

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