Satya Darshan

'हिंद स्वराज' से : हिंदुस्तान कैसे गया ?

मई 1, 2019

गतांक से आगे...

पाठक : आपने सभ्‍यता के बारे में बहुत कुछ कहा; और मुझे विचार में डाल दिया। अब तो मैं इस संकट में आ पड़ा हूँ कि यूरोप की प्रजा से मैं क्‍या लूँ और क्‍या न लूँ। लेकिन एक सवाल मेरे मन में तुरंत उठता है : अगर आज की सभ्‍यता बिगाड़ करने वाली है, एक रोग है, तो ऐसी सभ्‍यता में फँसे हुए अंग्रेज हिंदुस्‍तान को कैसे ले सके? इसमें वे कैसे रह सकते हैं?

संपादक : आपके इस सवाल का जवाब कुछ आसानी से दिया जा सकेगा और अब थोड़ी देर में हम स्वराज के बारे में भी विचार कर सकेंगे। आपके इस सवाल का जवाब अभी देना बाकी है, यह मैं भूला नहीं हूँ। लेकिन आपके आखिरी सवाल पर हम आएँ। हिंदुस्‍तान अंग्रेजों ने लिया सो बात नहीं है, बल्कि हमने उन्हें दिया है। हिंदुस्‍तान में वे अपने बल से नहीं टिके हैं, बल्कि हमने उन्हें टिका रखा है। वह कैसे सो देखें। आपको मैं याद दिलाता हूँ कि हमारे देश में वे दरअसल व्‍यापार के लिए आए थे। आप अपनी कंपनी बहादुर को याद कीजिए। उसे बहादुर किसने बनाया? वे बेचारे तो राज करने का इरादा भी नहीं रखते थे। कंपनी के लोगों की मदद किसने की? उनकी चाँदी को देखकर कौन मोह में पड़ जाता था? उनका माल कौन बेचता था? इतिहास सबूत देता है कि यह सब हम ही करते थे। जल्‍दी पैसा पाने के मतलब से हम उनका स्‍वागत करते थे। हम उनकी मदद करते थे। मुझे भाँग पीने की आदत हो और भाँग बेचने वाला मुझे भाँग बेचे, तो कसूर बेचने वाले का निकालना चाहिए या अपना खुद का? बेचने वाले का कसूर निकालने से मेरा व्‍यसन थोड़े ही मिटने वाला है? एक बेचने वाले को भगा देंगे तो क्‍या दूसरे मुझे भाँग नहीं बेचेंगे? हिंदुस्‍तान के सच्‍चे सेवक को अच्‍छी तरह खोज करके इसकी जड़ तक पहुँचना होगा। ज्‍यादा खाने से अगर मुझे अजीर्ण हुआ हो, तो मैं पानी का दोष निकाल कर अजीर्ण दूर नहीं कर सकूँगा। सच्‍चा डॉक्‍टर तो वह है जो रोग की जड़ खोज। आप अगर हिंदुस्‍तान के रोग के डॉक्‍टर होना चाहते हैं, तो आपको रोगी की जड़ खोजनी ही पड़ेगी।

पाठक : आप सच कहते हैं। अब मुझे समझने के लिए आपको दलील करने की जरूरत नहीं रहेगी। मैं आपके विचार जानने के लिए अधीर बन गया हूँ। अब हम बहुत ही दिलचस्‍प विषय पर आ गए हैं, इसलिए मुझे आप अपने ही विचार बताएँ। जब उनके बारे में शंका पैदा होगी तब मैं आपको रोकूँगा।

संपादक : बहुत अच्‍छा। पर मुझे डर है कि आगे चलने पर हमारे बीच फिर से मतभेद जरूर होगा। फिर भी जब आप मुझे रोकेंगे तभी मैं दलील में उतरूँगा। हमने देखा हे कि अंग्रेज व्‍यापारियों को हमने बढ़ावा दिया तभी वे हिंदुस्‍तान में अपने पैर फैला सके। वैसे ही जब हमारे राजा लोग आपस में झगड़े तब उन्‍होंने कंपनी बहादुर से मदद माँगी। कंपनी बहादुर व्‍यापार और लड़ाई के काम में कुशल थी। उसमें उन नीति-अनीति की अड़चन नहीं थी। व्‍यापार बढ़ाना और पैसा कमाना, यही उनका धंधा था। उसमें जब हमने मदद दी तब उसने हमारी मदद ली और अपनी कोठियाँ बढ़ाई। कोठियों का बचाव करने के लिए उसने लश्‍कर रखा। उस लश्‍कर का हमने उपयोग किया, इसलिए अब उसे दोष देना बेकार है। उस वक्‍त हिंदू-मुसलमानों के बीच बैर था। कंपनी को उससे मौका मिला। इस तरह कंपनी के लिए ऐसे संजोग पैदा किए, जिससे हिंदुस्‍तान पर उसका अधिकार हो जाए। इस लिए हिंदुस्‍तान गया ऐसा कहने के बजाए ज्यादा सच यह कहना होगा कि हमने हिंदुस्‍तान अंग्रेजों को दिया।

पाठक : अब अंग्रेज हिंदुस्‍तान को कैसे रख सकते हैं सो कहिए।

संपादक : जैसा हमने हिंदुस्‍तान उन्हें दिया वैसे ही हम हिंदुस्‍तान को उनके पास रहने देते हैं। उन्‍होंने तलवार से हिंदुस्‍तान लिया ऐसा उनमें से कुछ कहते हैं, और ऐसा भी कहते हैं कि तलवार से वे उसे रख रहे हैं। ये दोनों बातें गलत हैं। हिंदुस्‍तान को रखने के लिए तलवार किसी काम में नहीं आ सकती; हम खुद ही उन्हें यहाँ रहने देते हैं।

नेपोलियन ने अंग्रेजों को व्‍यापारी प्रजा कहा है। वह बिलकुल ठीक बात है। वे जिस देश को (अपने काबू में) रखते हैं, उसे व्‍यापार के लिए रखते हैं, यह जानने लायक है। उनकी फौजें और जंगी बेड़े सिर्फ व्‍यापार की रक्षा के लिए हैं। जब ट्रांसवाल में व्‍यापार का लालच नहीं था तब मि. ग्‍लेडस्‍टन को तुरंत सूझ गया कि ट्रांसवाल अंग्रेजों को नहीं रखना चाहिए। जब ट्रांसवाल में व्‍यापार का आकर्षण देखा तब उससे लड़ाई की गई और मि. चेंबरलेन ने यह ढूँढ़ निकाला कि ट्रांसवालपर अंग्रेजों की हुकूमत है। 

मरहूम प्रेसिडंट क्रूगर से किसी ने सवाल किया : 'चाँद में सोना है या नहीं?' उसने जवाब दिया : 'चाँद में सोना होने की संभावना नही है, क्‍योंकि सोना होता तो अंग्रेज अपने राज के साथ उसे जोड़ देते।' पैसा उनका खुदा है, यह ध्‍यान रखने से सब बातें साफ हो जाएगी।

तब अंग्रेजों को हम सिर्फ अपनी गरज से रखते हैं। हमें उनका व्‍यापार पसंद आता है। वे चालबाजी करके हमें रिझाते हैं और रिझाकर हमसे काम लेते हैं। इसमें उनका दोष निकालना उनकी सत्‍ता को निभाने जैसा है। इसके अलावा, हम आपस में झगड़कर उन्हें ज्‍यादा बढ़ावा देते हैं।

अगर आप ऊपर की बातों को ठीक समझते हैं, तो हमने यह साबित कर दिया कि अंग्रेज व्‍यापार के लिए यहाँ आए, व्‍यापार के लिए यहाँ रहते हैं और उनके रहने में हम ही मददगार हैं। उनके हथियार तो बिलकुल बेकार हैं।

इस मौके पर मैं आपको याद दिलाता हूँ कि जापान में अंग्रेजी झंडा लहराता है ऐसा आप मानिए। जापान के साथ अंग्रेजों ने जो करार किया है वह अपने व्‍यापार के लिए किया है। और आप देखेंगे कि जापान में अंग्रेज लोग अपना व्‍यापार खूब जमाएँगे। अंग्रेज अपने माल के लिए सारी दुनिया को अपना बाजार बनाना चाहते हैं। यह सच है कि ऐसा वे नहीं कर सकेंगे। इसमें उनका कोई कसूर नहीं माना जा सकता। अपनी कोशिश में वे कोई कसर नहीं रखेंगे।

क्रमशः

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