Satya Darshan

पंडित सुंदरलाल शर्मा: पराशर गोत्रीय गांधीवादी ब्राह्मण जिसने अछूतों को मय हूजूम मंदिर मे प्रवेश कराया

(21 दिसम्बर 1881 : 28 दिसम्बर 1940)

✍️जयंती आलेख

महानदी के तट पर विशाल भीड़ दम साधे खड़ी थी, उन्नत माथे पर त्रिपुण्ड लगाए एक दर्जन पंडितो नें वेद व उपनिषदों के मंत्र व श्लोक की गांठ बांधे उस प्रखर युवा से प्रश्न पर प्रश्न कर रहे थे और वह अविकल भाव से संस्कृत धर्मग्रंथों से ही उनके प्रश्नों का उत्तर दे रहे थे।

बौखलाए धर्मध्वजा धारी त्रिपुण्डी पंडितो नें ऋग्वेद के पुरूष सूक्त के चित परिचित मंत्र का सामूहिक स्वर में उल्लेख किया -

ब्राह्मणोsस्य् मुखमासीद्वाहू राजन्य: कृत:।
उरू तदस्य यद्वैश्य: पद्मच्य : शूद्रो अजायत:।।

धवल वस्त्र धारी युवा नें कहा महात्मन इसका हिन्दी अनुवाद भी कह दें ताकि भीड़ इसे समझ सके। उनमें से एक नें अर्थ बतलाया - विराट पुरूष के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, जंघा से वैश्य तथा पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए।

युवक तनिक मुस्कुराया और कहा हे ब्राह्मण श्रेष्ठ, इस मंत्र का अर्थ आपने अपनी सुविधानुसार ऐसा कर लिया है, इसका अर्थ है उस विराट पुरूष अर्थात समाज के ब्राह्मण मुख सदृश हैं, क्षत्रिय उसकी भुजाए हैं, वैश्य जंघा है और शूद्र पैर, जिस प्रकार मनुष्य इन सभी अंगों में ही पूर्ण मनुष्य है उसी प्रकार समाज में इन वर्णों की भी आवश्यकता है। वर्ण और जाति जन्मंगत नहीं कर्मगत हैं इसीलिए तो यजुर्वेद कहता है –

नमस्तवक्षभ्यो रथकारभ्यनश्चम वो नमो: कुलालेभ्य: कर्मरेभ्यश्च वो नमो।
नमो निषादेभ्य: पुजिष्ठेभ्यश्च वो नमो नम: श्वनिभ्यों मृत्युभ्यश्च वो नम:।।

बढ़ई को मेरा नमस्कार, रथ निर्माण करने वालों को मेरा नमस्कार, कुम्हारों को को मेरा नमस्कार, लोहारों को मेरा नमस्कार, मछुवारों को मेरा नमस्कार, व्याघ्रों को मेरा नमस्कार। आखिर हमारा वेद स्वयं इनको नमस्कार करता है तो हम आप कौन होते हैं इन्हें सामाजिक वर्ण व्यवस्था के आधार पर मंदिर में प्रवेश करने से रोकने वाले।

पंडितों ने एक दूसरे के मुख को देखा, युवा पूर्ण आत्मविश्वास के साथ वैदिक उद्हरणों की अगली कड़ी खोलने को उद्धत खड़ा था। पंडितों नें देर तक चल रहे इस शास्त्रार्थ को यहीं विराम देना उचित समझा उन्हें भान हो गया था कि इस युवा के दलीलों का तोड़ उनके पास नहीं है। भीड़ हर्षोल्लास के साथ राजीव लोचन जी का जयघोष करते हुए उस युवा के साथ मंदिर में प्रवेश कर गई।

23 नवम्बर 1925 को घटित इस घटना में जिस युवा के अकाट्य तर्कों से कट्टरपंथी पंडितों नें भीड़ को मंदिर प्रवेश की अनुमति दी वो युवा थे छत्तीसगढ़ के दैदीप्यमान नक्षत्र पं.सुन्दर लाल शर्मा। जो आगे चलकर छत्तीसगढ़ के गांधी नाम से प्रसिद्ध हुए।

पंडित सुन्दरलाल शर्मा का जन्म 21 दिसम्बर 1881 में छत्तीसगढ़ प्रांत के राजिम के पास चमसूर (चंद्रसूर) ग्राम में हुआ था।

आपके पिता पं. जयलाल शर्मा जो कांकेर रियासत में विधि सलाहकार थे, उनकी मां थीं देवमती देवी। पं. जयलाल बहुत ज्ञानी एंव सज्जन व्यक्ति थे। कांकेर राजा ने उन्हें 18 गांव प्रदान किये थे। पं. जयलाल बहुत अच्छे कवि थे और संगीत में उनकी गहरी रुचि थी। पं. सुन्दरलाल शर्मा की परवरिश इसी प्रगतिशील परिवार में हुई।

चमसुर गांव के मिडिल स्कूल तक सुन्दरलाल की पढ़ाई हुई थी। इसके बाद उनकी पढ़ाई घर पर ही हुई थी। उनके पिता ने उनकी उच्च शिक्षा की व्यवस्था बहुत ही अच्छे तरीके से घर पर ही कर दी थी। शिक्षक आते थे और सुन्दरलाल शर्मा ने शिक्षकों के सहारे घर पर ही अंग्रेजी, बंगला, उड़िया, मराठी भाषा का अध्ययन किया।

उनके घर में बहुत-सी पत्रिकाएँ आती थीं, जैसे- "केसरी" (जिसके सम्पादक थे लोकमान्य तिलक) "मराठा"। पत्रिकाओं के माध्यम से सुन्दरलाल शर्मा की सोचने की क्षमता बढ़ी। किसी भी विचारधारा को वे अच्छी तरह परखने के बाद ही अपनाने लगे। खुद लिखने भी लगे। कविताएँ लिखने लगे। उनकी कवितायें प्रकाशित भी होने लगीं।

1898 में उनकी कवितायें रसिक मित्र में प्रकाशित हुई। सुन्दरलाल न केवल कवि थे, बल्कि चित्रकार भी थे। चित्रकार होने के साथ-साथ वे मूर्तिकार भी थे। नाटक भी लिखते थे। रंगमंच में उनकी गहरी रुचि थी। वे कहते थे कि नाटक के माध्यम से समाज में परिवर्तन लाया जा सकता है।

उन्होंने लगभग 18 ग्रन्थ लिखे जिनमें 4 नाटक, 2 उपन्यास तथा शेष काव्य रचनाएँ है। 'गांधी मीमांसा', 'प्रहलाद चरित्र', 'करुणा-पचीसी' व 'सतनामी-भजन-माला' जैसे ग्रंथों के वह रचयिता है। इनकी 'छत्तीसगढ़ी-दीन-लीला' छत्तीसगढ़ का प्रथम लोकप्रिय प्रबंध काव्य है। छत्तीसगढ़ की राजनीति व देश के स्वतंत्रता आन्दोलन में उनका ऐतिहासिक योगदान है।

19 वीं सदी के अंतिम चरण में देश में राजनैतिक और सांस्कृतिक चेतना की लहरें उठ रही थी। समाज सुधारकों, चिंतकों तथा देशभक्तों ने परिवर्तन के इस दौर में समाज को नयी सोच और दिशा दी। छत्तीसगढ़ में आपने सामाजिक चेतना का स्वर घर-घर पहुंचाने में अविस्मरणीय कार्य किया।

पंडित सुन्दरलाल शर्मा, बंग-भंग विद्रोह के दौरान 1905 में राजनीति से जुड़े। 1906 में कांग्रेस से जुड़े। 1907 में आप कांंग्रेस के सूरत अधिवेशन में भी शामिल हुए और रायपुर आकर विदेशी वस्तुओ के बहिष्कार का प्रचार किया।

नहर के जल में लगने वाले जल कर के विरोध में जुलाई 1920 में नारायण मेघवाले के साथ मिलकर प. सुन्दरलाल शर्मा ने कसडोल में नहर सत्याग्रह का आयोजन किया। इस दौरान महात्मा गांधी जी (अली बंधू के साथ आये थे) का छत्तीसगढ़ में प्रथम आगमन हुआ।

21 जनवरी 1922 में सिहावा में नारायण मेघवाले के साथ मिलकर वन सत्याग्रह में भी सूत्रधार की भूमिका निभाई। दिसंबर 1923 में कांग्रेस के काकीनाड़ा (आंध्रा) अधिवेशन में भाग लेने के लिए पैदल जाने वालो में से एक थे।

आप राष्ट्रीय कृषक आंदोलन, मद्यनिषेध, आदिवासी आंदोलन, स्वदेशी आंदोलन जुड़े और स्वतंत्रता के यज्ञवेदी पर अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में व्याप्त रुढ़िवादिता, अंधविश्वास, अस्पृश्यता तथा कुरीतियों को दूर करने के लिए आपने अथक प्रयास किया।

प. सुन्दरलाल शर्मा ने अछूतों को जनेऊ धारण करने, शराब न पीने के लिए प्रेरित किया। 1925 में पंडित सुंदर लाल शर्मा ने छत्तीसगढ़ के मंदिरों में अछूतों के प्रवेश को लेकर आंदोलन चलाया। इसके तहत राजिम के प्रसिद्ध राजीव लोचन मंदिर में अछूतों के प्रवेश को लेकर योजना बनाई गई।

यह बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर द्वारा नासिक के प्रसिद्ध कालेराम मंदिर में दलितों के प्रवेश के आंदोलन से पहले की घटना है। इस आंदोलन से तत्कालीन ब्राह्मण समाज में खलबली मच गई। हालांकि पंडित सुंदर लाल शर्मा स्वंय ब्राह्मण थे लेकिन वे जाति के आधार पर छूआछूत के प्रबल विरोधी थे।

8 नवंबर 1925 को अछूतोद्धार हिंदू सभा की एक विशाल बैठक राजिम में हुई। इसकी अध्यक्षता नारायण राव मेघावले कर रहे थे। बैठक में संत,महात्मा, राजनेता, समाजसुधारक मौजूद थे। कई घंटे चले मंथन के बाद ये प्रस्ताव पास किया गया कि मंदिर में अछूतों को प्रवेश का अधिकार दिया जाए। ये ऐलान हुआ कि 15 दिन के अंदर अछूत जातियों के लोग राजीव लोचन मंदिर में प्रवेश करेंगे।

20 अप्रैल 1932 मे सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान आप गिरफ्तार किये गए।

महात्मा गांधी जब सन् 1933 में दूसरी बार छत्तीसगढ़ की यात्रा पर आये तब राजिम के पास नवापारा की सभा को संबोधित करते हुए कहा था कि सुंदरलाल शर्मा उम्र में तो मुझसे छोटे हैं परंतु हरिजनोध्दार के कार्य में मुझसे बड़े हैं।

असहयोग आंदोलन के दौरान छत्तीसगढ़ से जेल जाने वाले व्यक्तियों में आप प्रमुख थे। जीवन-पर्यन्त सादा जीवन, उच्च विचार के आदर्श का पालन करते रहे। समाज सेवा में रत परिश्रम के कारण शरीर क्षीण हो गया और 28 दिसम्बर 1940 को आपका निधन हुआ।

पंडित सुन्दरलाल शर्मा को 'छत्तीसगढ़ के राष्ट्रीय जागरण का अग्रदूत ' कहा जाता है। उनके सम्मान में उनके नाम पर प. सुन्दरलाल शर्मा मुक्त विश्वविद्यालय, छत्तीसगढ़ की स्थापना की गई है। छत्तीसगढ़ शासन ने उनकी स्मृति में साहित्य, आंचिलेक साहित्य के लिए पं. सुन्दरलाल शर्मा सम्मान स्थापित किया है।

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