Satya Darshan

तीजनबाई : जिन्होंने इकतारे पर उतारी महाभारत

जूही मिश्रा | अप्रैल 24, 2019

पौराणिक कथाओं की सबसे महान गाथाओं में से एक महाभारत! इसका एक स्वरूप वेद व्यास जी ने दिखाया और फिर कलयुग में दूरदर्शन पर बी.आर चोपड़ा ने. इसके बाद यदि कोई नाम याद आता है, तो वह है पद्मश्री तीजन बाई!

हाथ में इकतारा, सूती लाल रंग की धोती और धातु के भारी जेवर पहने मंच पर उतरी तीजन बाई ने अकेले ही महाभारत के हर किरदार को जिया है. वे 13 साल की उम्र से पंडवानी के जरिए दुनिया भर में महाभारत की कथाएं बांच रही हैं.

छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गांव से निकली तीजन ने कभी स्कूल की शक्ल तक नहीं देखी पर आज देश विदेश में उनके 200 से ज्यादा शिष्य हैं. ऐसी गुरू माता के जीवन को जानना काफी दिलचस्प होगा-

कभी स्कूल नहीं गई, पर लिखी कविताएं

साधारण परिचय के तौर पर कहा जाता है कि तीजनबाई छत्तीसगढ़ की लोकगायन शैली पंडवानी की गायिका हैं. पर यह काफी नहीं. दरअसल यह परिचय पूरी तरह सही नहीं है.

पहली बात यह कि पंडवानी गायन शैली न होकर गीति-नाट्य शैली है और तीजन बाई इस शैली की पहली महिला कलाकार हैं. तीजन के इस शैली में आने से पहले तक यहां केवल पुरुषों का वर्चस्व रहा.

पुरुष गाते थे और नाटक भी करते थे, लेकिन तीजन ने इस परंपरा को मिश्रित किया. वे नायक भी हैं, नायिका भी, गायिका भी, निर्देशिका भी और अभिनेता भी. यहां तक कि संवादों की लेखिका भी तीजन खुद ही हैं.

यह बात और है कि तीजन ने कभी स्कूल का मुंह तक नहीं देखा. 24 अप्रैल, 1956 को छत्तीसगढ़ के दुर्ग के पाटन ग्राम में जन्मी तीजन बाई अपने नाना बृजलाल पारधी के पास पली. पिता के परिवार में तो किसी का गायकी से दूर-दूर तक नाता नहीं था.

उस पर भी एक लड़की का गाना गाना तो समाज में बदनामी का कारण हो सकता था. सो छोटी तीजन को नाचने गाने और हुड़दंग मचाने से दूर ही रखा गया. तीजन के नाना पंडवानी के कलाकार थे. गांवों से लेकर शहरों तक उनकी टोलियां कार्यक्रम किया करती थीं. छत्तीसगढ़ की इस लोक कला से देश का बाकी हिस्सा अंजान ही रहा.

जब नाना पंडवानी का अभ्यास किया करते तो छोटी तीजन उन्हें छुपछुप कर देखा करती. उन्हें नाना के गायन, संवाद और वेषभूषा से खास लगाव रहा. जब घर में कोई नहीं होता तो हाथ में छड़ी रूपी इकतारा लिए, तीजन आइने के सामने पंडवानी गाती. एक बार तीजन ऐसे ही कमरे में पंडवानी की कविताएं गुनगुना रही थी, तभी नाना अपने कार्यक्रम से जल्दी घर आ गए.

बिना कोई आहट के जब वे तीजन के कमरेे में गए तो देखा कि छोटी तीजन आइने के सामने उनकी धोती लपेटे खड़ी पंडवानी की कविताएं गा रही है. नाना को अचानक कमरे में देखकर पहले तो वह डर गईं, पर जब देखा कि नाना मुस्कुरा रहे हैं तो उन्होंने अपने दिल की बात कह दी.

नाना ने तीजन के हुनर को सम्मान दिया और अपना शार्गिद बना लिया. उन्होंने महाभारत की कथाएं सुनाई और तीजन उन कथाओं को कविताओं में ढालती गई. एक बच्ची जिसने कभी स्कूल का मुंह तक न देखा हो, उसके भीतर ऐसी रचनात्मकता देखकर परिवार के सभी लोग च​कित थे.

नाना खास तौर पर खुश थे, क्योंकि उन्हें अपनी विरासत संभालने वाला कोई मिल गया था. तीजन आज भी जब मंच पर गाती हैं तो उनके हाथ में एक मोरपंख लगा हुआ इकतारा दिखाई देता है, जो उनके नाना ने तोहफे में दिया था.

महज 13 साल में हो गया था ब्याह

तीजन ने नाना के साथ कार्यक्रमों में जाना शुरू किया. जहां पुरुषों के हुजूम में केवल वही एक किशोरी रहती. पर बिना किसी डर के वह नाना को मंच पर देखती और सीखती रही. इसके बाद वह पहली बार 13 साल की उम्र में मंच पर अकेले उतरीं.

यह कार्यक्रम दुर्ग जिले के चंदखुरी गाँव में हुआ.

पुरुषों को एक बच्ची का पंडवानी गाना पहले तो रास न आया, पर जब नाना ने लोगों को समझाया तो वे उसे सुनने के लिए तैयार हो गए. तीजन ने अपने पहले की कार्यक्रम में शमा बांध दिया.

इकतारे पर चलती उसकी उंगलियों, चेहरे पर आते हाव-भाव और कंठ से निकली आवाज ने लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया.

पहले ही कार्यक्रम में नाम कमाने वाली तीजन की अब शादी की बारी थी. चूंकि यह वह दौर था, जहां बच्चियों को 13 साल के होने पर ब्याह दिया जाता था. सो परिवार वालों ने नन्ही तीजन की अपनी उम्र से दोगुने पारधी जनजाति में कर दिया गया.

यह वही जनजाति है, जहां महिलाओं के पंडवानी गाने पर पूरी तरह से बैन है. यह रिश्ता एक साल भी न चल सका. ससुराल वाले तीजन की गायकी से इस कदर खफा हुए कि गौना कराने ही नहीं आए.

नाना का साथ तब भी रहा और वह मंच पर गाती रही.

दुनिया में गाई महाभारत की कहानियां

उनकी अद्भुत लगन और प्रतिभा को देखकर उमेद सिंह देशमुख ने महान रंगमंच कर्मी हबीब तनवीर से उनकी मुलाकात करवाई. बस यहां से तीजन की किस्मत बदल गई. तनवीर ने तीजन को तत्कालीन पीएम इंदिरा गाँधी के सामने प्रतिभा दिखाने का मौका दिया. इसके बाद तीजन व पंडवानी देशभर में मशहूर हो गई.

इसके बाद शुरू हुआ कभी न थमने वाला सिलसिला. 1980 में तीजन ने सांस्कृतिक राजदूत के रूप में इंग्लैंड, फ्रांस, स्विट्ज़रलैंड, जर्मनी, टर्की, माल्टा, साइप्रस, रोमानिया और मारिशस की यात्रा की और वहाँ पर प्रस्तुतियाँ दीं.

उनका इकतारा कभी महाभारत के पात्र दुःशासन की बाँह बनता तो कभी अर्जुन का रथ, कभी भीम की गदा और कभी द्रौपदी के बालों का रूप धरकर दर्शकों को इतिहास के अध्यायों पर ले आता.

दर्शक तीजनबाई के साथ पात्र के मनोभावों को समझने लगे. ए​क ओर तीजनबाई शोहरत हासिल कर रही थीं वहीं निजी जिंदगी में उथल पुथल मची रही. बचपन की शादी टूटने के बाद तीजन ने तीन शादियां और कई. जिनमें से दो नाकाम रही और फिर उन्हें तुक्का राम के रूप में जीवन का अंतिम साथी मिला, जिसके साथ वे आज भी जी रही हैं.

तीजन की प्रतिभा ने उन्हें 1988 में पद्मश्री दिलवाया. इसके बाद 1995 संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2003 बिलासपुर विश्वविद्यालय के द्वारा डी. लिट. की मानद उपाधि और फिर 2003 पद्म भूषण का सम्मान हासिल हुआ.

200 से ज्यादा शिष्य ले रहें शिक्षा

वर्तमान में देश विदेश में उनके दो सौ से ज्यादा शिष्य हैं. तीजन विदेशी छात्रों को पंडवानी में पीएचडी के लिए तैयार करती हैं.

आमतौर पर जो पंडवानी गाई जाती रही है, तीजन उससे कुछ अलग क्रम में गाती हैं. जैसे आल्हा छंद में 31 मात्राएं हैं. यानि चौपाई से एक मात्रा कम ली जाती है, लेकिन 16-16 के बजाए 16-15 का क्रम चौपाई में वीरता का रस घोलता है.

तीजन ने पंडवानी में भी कुछ ऐसा ही प्रयोग किया है. चौदह-चौदह मात्राओं के दो चरण और बीच में बहर-ए-तबील जैसी लंबी पंक्तियों का प्रयोग करके उन्होंने पंडवानी का नया ही रूप प्रस्तुत किया. यह न तो पूरी तरह से छंदबद्ध होती है, न पूर्णत: कथा.

बल्कि, यह गद्य-पद्य मिश्रित चंपू शैली की नाट्य प्रस्तुति है.

तीजन कहती हैं कि जीवन में ज़रूरी और गैरज़रूरी के बीच चुनना आसान है पर दो समान रूप से ज़रूरी के बीच चुनना मुश्किल. जब भी किसी महिला के सामने यह मौका आता है तो वह सबसे पहले अपनी खुशियों, अपने हुनर को तिलाजंलि दे देती. इसके बाद पूरे जीवन भर घुटती है. वे फर्क से कहती हैं कि मैंने अपने हुनर को हर चीज से ज्यादा तवज्जो दी.

जीवन में सार्थकता की तलाश जितना पुरुष के लिए आवश्यक है उतना ही ज़रूरी स्त्री के लिए भी है.

हाल में ही जब तीजन बाई को दिल का दौरा पड़ा तो यह अफवाह उड़ी कि उनका देहांत हो गया है. जबकि, तीजन स्वस्थ्य हैं और आज भी पंडवानी की शिक्षा दे रही हैं. हालांकि वह शौहरत की दुनिया को अब वे अलविदा करके पति के साथ वापस गांव लौट गईं हैं. बावजूद इसके उनका नाम और योगदान भारतीय संस्कृति कला को आज भी कृतार्थ किए हुए है!

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