Satya Darshan

यू आर ए अनंतमूर्ति: सनातनी ब्राह्मण लेखक जिसकी निडर व तल्ख लेखनी ब्राह्मणवादी पाखंड से लेकर पीएम मोदी तक बेबाकी से चली

(21 दिसम्बर 1932 - 22 अगस्त 2014)

✍️जयंती विशेष

उडुपी राजगोपालाचार्य अनंतमूर्ति का जन्म शिमोगा जिले (मैसूर) के तिर्थहल्ली, मेलिगे के एक कुलीन ब्राह्मण परिवार मे हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा दुर्वासापुरा के पारंपरिक संस्कृत पाठशाला में शुरु हुई। इसके बाद की शिक्षा तिर्थहल्ली और मैसूर में हुई।

मैसूर विश्वविद्यालय से परास्नातक की उपाधि हासिल करने के बाद आगे के अध्ययन के लिए वे राष्ट्रमंडल छात्रवृत्ति लेकर इंगलैंड चले गए।

उन्होंने 1966 ई. में बर्मिंघम विश्वविद्यालय से "1930 में राजनीति और साहित्य" शीर्षक शोधग्रंथ लिखकर शोध उपाधि हासिल की।

अनंतमूर्ति एक सुप्रसिद्ध कन्नड़ साहित्यकार और शिक्षाविद् थे जिन्हें कन्नड़ साहित्य के नव्या आंदोलन का प्रणेता माना जाता है। इनकी सबसे प्रसिद्ध रचना संस्कार है। ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले आठ कन्नड़ साहित्यकारों में वे छठे हैं।

1987 से 1991 तक वे केरल के महात्मा गांधी विश्वविद्यालय के कुलपति रहे। 1992 में नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष बनाए गए। अगले साल उन्हें दिल्ली की साहित्य अकादमी का अध्यक्ष चुना गया। दो बार पुणे स्थित फिल्म और टेलीविजन इंस्टीट्यूट के चेयरमैन बने।

2012 में कर्नाटक के केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलाधिपति बनाए गए। वे जहां भी रहे, लोकतांत्रिक पद्धति से काम किया और अपने बारे में कम, संस्था के बारे में ज्यादा सोचा। प्रतिष्ठान में रहते हुए भी वे प्रतिष्ठानवादी नहीं थे।

साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए सन 1998 में भारत सरकार द्वारा इन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। 2013 के मैन बुकर पुरस्कार पाने वाले उम्मीदवारों की अंतिम सूची में इन्हें भी चुना गया था।

फणीश्वरनाथ रेणु के बाद यू आर अनंतमूर्ति शायद दूसरे भारतीय कथाकार हैं जिन्होंने हिंदू समाज में जाति की केंद्रीयता को इतनी तीव्रता से पहचाना था। जब 1965 में वे अपने उपन्यास संस्कार के साथ कन्नड़ के साहित्य क्षितिज पर प्रगट हुए, तो एक धमाका-सा हुआ। लेखक स्वयं ब्राह्मण था और ब्राह्मण समाज के पाखंड को बड़ी तल्खी के साथ उजागर कर रहा था।

यह साहित्य के साथ-साथ एक सामाजिक घटना भी थी। इसी से कन्नड़ साहित्य में ‘‘नव्या’’ आंदोलन की शुरुआत मानी जाती है, जिसने कन्नड़ लेखकों के दो वर्ग बना दिए। एक वर्ग भैरप्पा जैसे परंपरावादी लेखकों का जो वृहत सामाजिक वृत्त प्रस्तुत करते हुए भी भारतीय समाज में उभर रहे अंर्तर्द्वंद्वों के साक्षी बनना नहीं चाहते थे और दूसरा अनंतमूर्ति जैसे लेखकों का जो नए और प्रगतिशील मूल्यों के साथ थे।

उडुपी राजगोपालाचार्य अनंतमूर्ति, या सीधे यू आर ए अनंतमूर्ति कहने पर जो पहली चीज जेहन में आती है है वह है एक अनंत विद्रोह की चेतना। वह विद्रोह जो उनके उपन्यास 'संस्कार' में चरम पर दिखता है पर जो हकीकत में उनके सारे लेखन और जीवन की अंतर्धारा है.

अनंतमूर्ति के लेखन की सबसे ख़ास बात है कि उनके यहाँ विद्रोह सायास लाया हुआ नहीं दिखता। न ही उनके लेखन में यह विद्रोह किसी ट्रोप, या प्रविधि की तरह नहीं आता बल्कि जिए हुए जीवन की सच्चाइयों से निकलता है।

अनंतमूर्ति का जिया हुआ जीवन भी बहुत दिलचस्प है। एक अति सांस्कारिक ब्राह्मण परिवार में पले बढ़े बच्चे से प्रतिगामी मूल्यों के खिलाफ खड़े आधुनिक वैज्ञानिक चेतना से लैस साहित्यकार बनने का उनका सफर एक पूरी पीढ़ी का सफर है।

उस पीढ़ी का जिसने औपनिवेशिक भारत के उतार के दौर से जीवन शुरू कर पहले एक बहुलतावादी लोकतान्त्रिक भारत को बनते देखा है और फिर 1980 से उस भारत पर बढ़ते हिन्दूवादी हमले भी।

कहने की जरूरत नहीं कि संकीर्णतावादी और प्रतिगामी चेतना के न केवल खतरे उन्हें साफ़ दिखते थे बल्कि वह उनसे लड़ने को तैयार थे। एक जानीमानी शख्सियत आशीष नंदी के शब्दों मे कहें तो एक शास्त्रीय फासीवादी नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना उन्हें अस्वीकार ही नहीं असहनीय भी था और यह उनके ऐसी दशा में भारत छोड़ देने के बयान का कारण था।

यहाँ फिर अनंतमूर्ति के जीवन विशिष्टता दिखती है- वह निष्क्रिय आलोचना या विरोध के पक्षधर नहीं बल्कि सक्रिय प्रतिरोध के झंडाबरदार थे, जनता के खेमे में खड़े अवययी बुद्धिजीवी थे।

फिर यह प्रतिबद्धता केवल मोदी के प्रधानमंत्री बनने जैसे 'बड़े' सवालों पर नहीं जागती थी बल्कि समसामयिक आंदोलनों के ऐसे मुद्दों पर भी अनंतमूर्ति पूरी ताकत से जनता खड़े होते थे जिनपर और 'बुद्धिजीवी' बचने की कोशिश करते थे।

सिर्फ एक उदाहरण लें तो तेलंगाना में छात्रों के बीफ और पोर्क खाने की आजादी की मांग से शुरू होकर पूरे देश में फ़ैल गए भोजन के लोकतान्त्रिक अधिकार के आंदोलन के पक्ष में खड़े होने वाले गिने चुने बुद्धिजीवियों में से अनंतमूर्ति एक थे। गौरतलब है कि उन्होंने अपना मत पेजावर मठ के मठाधीश की निर्मम आलोचना के बाद भी नहीं बदला था।

अनंतमूर्ति के जीवन और लेखन दोनों में यह पक्षधरता आयी कहाँ से? इसी सवाल का जवाब हमें उनकी महत्वपूर्ण कहानी "घाट श्राद्ध" तक ले जाता है।

वह कहानी जिसमे वैदिक संस्कृत विद्यालय में पढ़ने वाला एक बच्चा गर्भवती ब्राह्मण विधवा के साथ खड़ा होता है, की कोशिश करता है पर फिर हार जाता है और उस महिला का घाट श्राद्ध (जीवित व्यक्ति का मृत्यु संस्कार) होते हुए देखता है। इस कहानी और बाद में इसके फिल्मांकन ने कन्नड़ भाषा में नव्या आंदोलन ही नहीं शुरू किया बल्कि कन्नड़ सिनेमा को भी एक नयी चेतना, नयी भाषा दी।

शुद्ध-अशुद्ध और ऊँच नीच की अवधारणा पर टिके ब्राह्मण वाद का प्रतिकार उनके लेखन का प्रतिनिधि स्वर बन के उभरता है। उससे भी दिलचस्प यह कि अनंतमूर्ति ब्राह्मणवाद की आलोचना का हथियार अक्सर उसके अंदर की अमानवीयता और अंतर्विरोधों को बनाते हैं, उसकी मूल मान्यताओं पर हमला करते हैं।

वे दिखाते हैं कि ब्राह्मणवादी पाखंड अंदर से कितना खोखला है। उनका प्रसिद्द उपन्यास 'संस्कार' उनकी इस विशिष्ट लेखन शैली का उरूज है। इस उपन्यास में वे एक कर्मकांडी ब्राह्मण और मांस मदिरा खाने वाले और एक वेश्या से मित्रता रखने वाले ब्राह्मण के अंतर्संबंधों को आधार बना कर पवित्रता के मिथक को ध्वस्त करते हैं।

अनंतमूर्ति के लेखन की यही विशिष्टता उनके गल्प लेखन को सामाजिक विज्ञान पर लाकर खड़ा कर देती है। उनके गांवों, विद्यालयों, परंपराओं और संस्कारों का वर्णन काल्पनिक नहीं बल्कि समाजशास्त्रीय वर्णन है, ऐसा वर्णन जिसके आधार पर जातीय परंपराओं पर निर्णायक शोध किये जा सकते हैं।

यह एक बात है जो धीरे धीरे समाज से कटते जा रहे हिंदी साहित्य को अनंतमूर्ति से सीखना चाहिए। दुनिया का कोई भी साहित्य निर्वात में टंगा नहीं हो सकता, उसे अपनी सार्थकता के लिए अपनी जमीन अपनी जड़ों से जुड़ना ही पड़ता है।

अनंतमूर्ति का यह चुनाव अंग्रेजी का प्रोफ़ेसर होने के बाद भी कन्नड़ में लिखने में ही नहीं बल्कि उनकी कहानियों, उपन्यासों और सारे लेखन में दिखता है। यही है शायद जो उनकी सार्वकालिक महानता की एक वजह भी है।

22 अगस्त 2014 को 81 वर्ष की अवस्था में बंगलूर (कर्नाटक) में आपका निधन हो गया।

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